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13 सितंबर से शुरू हो रहा है पितृ पक्ष, जानें किस दिन कौन सा श्राद्ध

नई दिल्लीः भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं. इस दौरान जिस तिथि में पूर्वजों या परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु होती है, उसी तिथि को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है. शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों का जो भी व्यक्ति अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसे सभी दोषों से मुक्ति मिलती है और घर-परिवार, व्यवसाय और आजीविका में हमेशा उन्नति होती है. पितृ दोष के अनेक कारण होते हैं, जिसमें परिवार में किसी की अकाल मृत्यु होने से, मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध नहीं करने से और उनका वार्षिक श्राद्ध न करने से पितरों को दोष लगता है.

अगर परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो तो पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करवाना चाहिए. प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण जरूर करना चाहिए. भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध से श्राद्ध पक्ष शुरू होता है, प्रथम दिन के श्राद्ध को प्रतिपदा श्राद्ध कहा जाता है. प्रतिपदा श्राद्ध में जिस भी व्यक्ति की मृत्यु प्रतिपदा तिथि (शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष) के दिन होती हैं उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाता है.
तर्पण के लिए सामग्री
श्राद्ध में तर्पण करने के लिए तिल, जल, चावल, कुशा, गंगाजल आदि का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए. वहीं केला, सफेद पुष्प, उड़द, गाय के दूध, घी, खीर, स्वांक के चावल, जौ, मूंग, गन्ना से किए गए श्राद्ध से पितर प्रसन्न होते हैं. श्राद्ध के दौरान तुलसी, आम और पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं और सूर्यदेवता को सूर्योदय के समय अर्ध्य देना न भूलें.
श्राद्ध में कौओं का महत्त्व -
मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं. अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वह रुष्ट हो जाते हैं. इस कारण श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है.

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पितृ विसर्जन क्या है?
मान्यता है कि पितृपक्ष में पितृ धरती पर उतरते हैं और पितृ विसर्जन यानि श्राद्ध पक्ष की अमावस्या को विदा हो जाते हैं. कहते हैं कि जो अपने पितृ को सम्मान स्वरूप अन्न जल प्रदान करता है उससे प्रसन्न होकर पितृ सहर्ष शुभाशिष प्रदान कर अपने लोक में लौट जाते हैं. भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आष्विन मास की अमावस्या तक का समय अपने पितरों और पूर्वजों का पूजन, याद करने और उनकी मुक्ति के लिए दान करने का होता है.

पितृपक्ष श्राद्ध तिथियां 2019
पूर्णिमा श्राद्ध - 13 सितंबर, शुक्रवार
प्रतिपदा श्राद्ध - 14 सितंबर, शनिवार
द्वितीया श्राद्ध - 15 सितंबर, रविवार
तृतीया श्राद्ध - 16 सितंबर, सोमवार
चतुर्थी श्राद्ध - 17 सितंबर, मंगलवार
पंचमी श्राद्ध - 18 सितंबर, बुधवार
षष्ठी श्राद्ध - 19 सितंबर, गुरुवार
सप्तमी श्राद्ध - 20 सितंबर, शुक्रवार
अष्टमी श्राद्ध - 21 सितंबर, शनिवार
नवमी श्राद्ध - 22 सितंबर, रविवार
दशमी श्राद्ध - 23 सितंबर, सोमवार
एकादशी श्राद्ध - 24 सितंबर, मंगलवार
द्वादशी श्राद्ध - 25 सितंबर, बुधवार
त्रयोदशी श्राद्ध - 26 सितंबर, गुरुवार
चतुर्दशी श्राद्ध - 27 सितंबर, शुक्रवार
अमावस्या श्राद्ध - 28 सितंबर, शनिवार

पूजन के समय इन मंत्रों का करें जाप
ॐ सर्व पितृ देवताभ्यो नमः
ॐ पितृ नारायणाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

 

 

 

सौजन्य ज़ी न्यूज 

 

 

10 September, 2019

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